अपने आडवाणी जी वाकई बहुत जल्दी में हैं। 'पी एम इन वेटिंग ' का खिताब पाने के बाद वे 'ओरिजनल' पी एम बनना चाहते हैं। इसके लिए वे युद्ध-स्तर पर काम कर रहे हैं। एक ओर जहाँ वे मनमोहन को सोनिया गाँधी की कठपुतली बनाकर मजाक उड़ा रहे हैं,वहीं दूसरी ओरउन्होंने चुनावी-मैदान में अपने मुखौटे उतार दिए हैं।
आडवाणी जी के मुखौटे उतारने के पीछे यह सोच हो सकती है कि अटल जी तो भाजपा के मुखौटे के रूप में विख्यात थे और वे पी एम भी बने,मनमोहन जी ,उनके अनुसार एक मुखौटे की ही तरह काम कर रहे हैं! फिर गुजरात में नरेन्द्र भाई मुखौटे लगवाकर दोबारा सत्ता पा सकते हैं तो यह 'फार्मूला' अपन पर भी फिट हो सकता है!
दर-असल जनता को और देश को आज मुखौटों की ही ज़रूरत है। अपने सही और वास्तविक रूप में न नेता जनता के सामने आ सकते हैं और न जनता ही उन्हें सर-माथे पर बिठा सकती है। इसलिए जब मुखौटों से ही काम चलता हो तो 'ओरिजनल लुक' कौन देखता है? अब राजनीति के साथ-साथ नेता भी एक 'उत्पाद' बन गया है और यह जनता की नियति है की वह 'कस्टमर' बनकर कष्ट से मरती रहे!
अब हमें तो पूरा यकीन हो गया है कि आडवाणी जी 'पी एम ' बनने जा रहे हैं आपको हो या न हो !
मंगलवार, 10 मार्च 2009
गुरुवार, 5 मार्च 2009
जय हो! जय हो!
काफ़ी दिनों बाद कांग्रेस के लिए एक ख़बर खुशी की आई है।'स्लम डॉग मिलियनेयर ' फ़िल्म हिट क्या हुई उसके बनाने वाले,उसमें काम करने वाले मालामाल तो हुए ही उसे देखने और उसका संगीत सुनने वाले भी मालामाल होने की राह पर हैं! फ़िल्म को आठ ऑस्कर पुरस्कार तो मिले ही ,रहमान,गुलज़ार,रसूल भी ने अपना झंडा खूब गाड़ा है। अब उन सबकी कामयाबी से प्रेरित होकर कांग्रेस पार्टी ने 'जय हो' के गाने के अधिकार खरीद लिए हैं। इस से उसे लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में जय पाने का अधिकार भी जनता से मिल गया है।
फ़िल्म अच्छी है,(चूंकि यह साबित हो चुका है) संगीत अच्छा है तो क्या उसे आधार बनाकर देश के युवाओं को सम्मोहित किया जा सकता है? जैसा कि बताया जाता है कि राहुल गाँधी के 'टारगेट' युवा हैं तो पार्टी ने ऐसे मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए एक 'मद-मस्त ' धुन का चुनाव किया है, जिसके ख़ुमार में देश का युवा बेसुध और मस्त हो जाय और उसे अपने रोज़गार और शिक्षा जैसे सवाल फ़ालतू लगें !
उम्मीद ही की जा सकती है कि इन चुनावों में जय पाने के बाद कांग्रेस पार्टी जनता की भी जय का अभियान चलाएगी और यह कि केवल अपनी जीत पाने भर के लिए उसने ग़रीबी को एक बिकाऊ 'आइटम' नहीं बनाया है।
फ़िल्म अच्छी है,(चूंकि यह साबित हो चुका है) संगीत अच्छा है तो क्या उसे आधार बनाकर देश के युवाओं को सम्मोहित किया जा सकता है? जैसा कि बताया जाता है कि राहुल गाँधी के 'टारगेट' युवा हैं तो पार्टी ने ऐसे मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए एक 'मद-मस्त ' धुन का चुनाव किया है, जिसके ख़ुमार में देश का युवा बेसुध और मस्त हो जाय और उसे अपने रोज़गार और शिक्षा जैसे सवाल फ़ालतू लगें !
उम्मीद ही की जा सकती है कि इन चुनावों में जय पाने के बाद कांग्रेस पार्टी जनता की भी जय का अभियान चलाएगी और यह कि केवल अपनी जीत पाने भर के लिए उसने ग़रीबी को एक बिकाऊ 'आइटम' नहीं बनाया है।
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
चुनावी चकल्लस!
लोकसभा चुनावों के नज़दीक आते ही हर राजनीतिक दल ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कांग्रेस सत्ता का सुख भोग रही है तो उसे उस सत्ता को बचाना है और भाजपा सत्ता को दूर किनारे से अपने पास लाना चाहती है। छोटे और क्षेत्रीय दल भी अपनी-अपनी गोटियाँ बिछाने में जुट गए हैं।
यूपीए सरकार औपचारिक चुनावी-कार्यक्रम के ऐलान से पहले दनादन राहतों के ऐलान किए जा रही है। यह सरकार बहुत जल्दी में है तथा यह भी जताना चाह रही है कि यदि विकास की गति को धीमा नहीं करना चाहते हो तो यथा-स्थिति में ही जनता की भलाई है। राहुल गाँधी को आगे करके युवा वोटरों को पटाने की मंशा साफ़ दिखाई देती है।
भाजपा तो कब से तैयार बैठी है। उसके पास दूल्हा भी है,ढोल -बाजे भी हैं पर साथ में बाराती कितने आएंगे यह नहीं पता चल रहा है। आडवाणी जी ने पूरा खाका खींच रखा है। 'अभी नहीं तो कभी नहीं' की तर्ज़ पर काम कर रहे हैं । अपना प्रचार केवल हिंदुस्तान में ही नहीं पाकिस्तान के अख़बारों में भी कर रहे हैं। 'ब्लॉग' लिख रहे हैं,वेब -
साईट चल रही है,युवा दिखने के लिए जिम जा रहे हैं। अरे भाई, अब इस बुढापे में और क्या -क्या करवाओगे ?
बाकी छोटे-मोटे दल और नेता भी अपनी-अपनी औकात के अनुसार भेंट-मुलाकात करके 'मार्केट-वैल्यू'' बढ़ा रहे हैं।अब आने वाला चुनाव ही सबको उनकी हैसियत बताएगा!
यूपीए सरकार औपचारिक चुनावी-कार्यक्रम के ऐलान से पहले दनादन राहतों के ऐलान किए जा रही है। यह सरकार बहुत जल्दी में है तथा यह भी जताना चाह रही है कि यदि विकास की गति को धीमा नहीं करना चाहते हो तो यथा-स्थिति में ही जनता की भलाई है। राहुल गाँधी को आगे करके युवा वोटरों को पटाने की मंशा साफ़ दिखाई देती है।
भाजपा तो कब से तैयार बैठी है। उसके पास दूल्हा भी है,ढोल -बाजे भी हैं पर साथ में बाराती कितने आएंगे यह नहीं पता चल रहा है। आडवाणी जी ने पूरा खाका खींच रखा है। 'अभी नहीं तो कभी नहीं' की तर्ज़ पर काम कर रहे हैं । अपना प्रचार केवल हिंदुस्तान में ही नहीं पाकिस्तान के अख़बारों में भी कर रहे हैं। 'ब्लॉग' लिख रहे हैं,वेब -
साईट चल रही है,युवा दिखने के लिए जिम जा रहे हैं। अरे भाई, अब इस बुढापे में और क्या -क्या करवाओगे ?
बाकी छोटे-मोटे दल और नेता भी अपनी-अपनी औकात के अनुसार भेंट-मुलाकात करके 'मार्केट-वैल्यू'' बढ़ा रहे हैं।अब आने वाला चुनाव ही सबको उनकी हैसियत बताएगा!
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