मंगलवार, 12 मई 2009

सरकार के लिए जोड़-तोड़ !

नयी लोकसभा का गठन अब अपने अन्तिम चरण में है। जितनी अनिश्चितता और आशंकाएं इस बार के चुनावों में मतदाता के मन में रही हैं,उतनी शायद कभी नहीं रही। यह चुनाव असली मुद्दों से ज़्यादा भड़काऊ भाषणों ,करोड़पति उम्मीदवारों,अशालीन आक्षेपों और अनगिनत प्रधानमंत्री पदसंभावित उम्मीदवारों के लिए ज़्यादा जाना जाएगा! सरकार बनाने की प्रक्रिया में छोटे और क्षेत्रीय दलों की करवट के बारे में भी अलग-अलग तरह के कयास लगाये जा रहे हैं ,पर हर कोई अपने सारे पत्ते खुला रखना चाहता है।
वामपंथियों की लाख घुड़कियों के बावजूद यह हर कोई जानता है कि वोह कांग्रेस से परहेज़ नहीं कर सकती क्योंकि उसका 'थर्ड -फ्रंट' परिणामों के निकलते ही चल बसेगा । जानकारों कि उम्मीद यही है कि अडवाणी जी को फिर से निराशा हाथ लगेगी और सत्ता आखिर 'हाथ' के ही पास रहेगी। अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो कांग्रेस आसानी से किसी और का खेल नहीं बनने देगी या फिर वह विपक्ष में बैठेगी !
सोलह मई का इंतज़ार सबको है पर सभी राजनैतिक दल अपनी लॉटरी का ख्वाब देख रहे हैं और जनता एक अदद सरकार के बनने का ,जिसकी प्रक्रिया में उसकी आंशिक या कहिये प्रतीकात्मक भागीदारी है!

मंगलवार, 24 मार्च 2009

वरुण भाजपा के नए हथियार !

अब लगने लगा है कि अपना देश पूरी तरह से चुनावी बुखार की गिरफ़्त में आ चुका है। सत्ता की दौड़ में बने रहने के लिए सभी पार्टियाँ आखिरी वार में जुटी हैं लेकिन भाजपा का चुनावी अभियान बड़ा ही दिलचस्प है। पार्टी के 'पी.एम.' पद के घोषित उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी लिए यह आखिरी समर है। इस अभियान की शुरुआत करते हुए नए व आधुनिक तरीके आजमाने का काम शुरू हुआ था पर चुनाव की औपचारिक घोषणा होते-होते पार्टी अपने परम्परागत हथियारों की शरण लेने को मजबूर हो रही है। इसकी खास वजह यही रही कि चुनाव में बहुमत की बात तो दूर उसके अपने सहयोगी दल किनारा करने लगे और पार्टी के अन्दर ही मतभेद शुरू हो गए । ऐसी दशा में आडवाणी जी को अपना 'सिंहासन' बहुत दूर भागता दिखायी दिया और अंत में वरुण गाँधी जैसे छोटे मोहरे को आगे करके हारी हुई बाज़ी को जीतने की कोशिश की गयी । वरुण ने पीलीभीत की सभा में जो कहा उसका जितना प्रचार-प्रसार और जितनी हील-हुज्ज़त हो उतना ही भाजपा से भागती-कुर्सी उसके पास आयेगी,ऐसा उन लोगों को लगता है जो भारतीय मतदाता का मानस ठीक तरह से नहीं जानते । वरुण के कहे हुए शब्दों को यहाँ दुहराने की ज़रूरत नहीं है ,वे शब्द भाजपा को थाती और कमाई समझकर अपने पास रख लेने चाहिए क्योंकि चुनाव बाद आडवाणी जी को तसल्ली देने के लिए कुछ नहीं होगा तो वे ही काम आएंगे।
यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की विडम्बना ही है कि आप गैर-कानूनी ,गैर-मानवीय बात करके भी अपनी छाती चौड़ी कर सकते हो और यह सोचते हो कि कोई तुम्हारा क्या कर लेगा?
भाजपा ने तो अपना अन्तिम अस्त्र चला दिया है क्योंकि उसे भी पता है कि अगले चुनाव उसे बहुत सुखद परिणाम नहीं देने जा रहे हैं पर वह शायद यह भूल रही है कि आखिरी वार तो मतदाताओं के ही हाथ में है और बहुत दिनों तक उसे कोई बरगला नहीं सकता है।

सोमवार, 16 मार्च 2009

पाकिस्तान में लोकतंत्र !

सोलह मार्च के 'लॉन्ग -मार्च' में पाकिस्तान की जनता के अलावा भारत की जनता और मीडिया की निगाहें लगी हुई थीं । शुक्र है कि इसका जो नतीज़ा फिलवक्त आया है वह लोकतंत्र की जीत के रूप में देखा जा रहा है। नवाज़ शरीफ ने वहां के अवाम की नब्ज़ टटोल ली थी और इसी जन-शक्ति के आगे ज़रदारी का कु-राज दम तोड़ गया। फौज़ी बगावत या किसी और तख्ता-पलट की आशंका के बीच पाकिस्तान के अन्दर में तब्दीली आयी है वह काबिले-गौर है पर वहां सत्ता बचाने और पाने का संघर्ष ख़त्म हो गया है, यह मानना बेवकूफ़ी होगी। आसिफ अली ज़रदारी ने बेनजीर की हत्या के बाद हुए चुनावों में स्वयं के लिए जनादेश नहीं पाया था,पर अपने अनुकूल समीकरण पाते ही उन्होंने राष्ट्रपति बनने की जितनी जल्द-बाजी दिखायी थी उसका तो हश्र ऐसा ही होना था।
पाकिस्तान धीरे-धीरे एक ऐसे अंध-कूप की तरह बढ़ता जा रहा है जहाँ गृह-युद्ध जैसे हालात से जूझना होगा। सेना,आई एस आई , तालिबान और कट्टरपंथियों के मुंह में जो खून लग चुका है,उसे साफ़ करने की हिम्मत वर्तमान परिदृश्य में दिखाई नहीं देती है ,अगर मियाँ शरीफ यह थोड़ा भरोसा जगा पाते हैं तो न केवल पाकिस्तान बल्कि पड़ोसी मुल्कों और सारी दुनिया के लिए अच्छा होगा।